₹5,000 करोड़ की टैक्स चोरी: क्या हरियाणा की रजिस्ट्री प्रणाली फेल हो रही है?
परिचय
हरियाणा की संपत्ति रजिस्ट्रेशन प्रणाली इन दिनों सवालों के घेरे में है। एक हालिया रिपोर्ट में सामने आया है कि राज्य की विभिन्न तहसीलों में संपत्ति की रजिस्ट्री करते समय PAN नंबर की एंट्री को अनदेखा किया जा रहा है। इसका नतीजा यह हो रहा है कि सरकार को हर साल लगभग ₹5,000 करोड़ की टैक्स की चपत लग रही है।
यह केवल आर्थिक नुकसान नहीं है, बल्कि यह प्रणालीगत भ्रष्टाचार, निगरानी की कमी और जवाबदेही के अभाव का जीता-जागता प्रमाण है।
समस्या की जड़: क्या हो रहा है गड़बड़?
जब कोई व्यक्ति जमीन या फ्लैट खरीदता है, तो उसकी कीमत एक निर्धारित सीमा से ऊपर जाती है (जैसे ₹10 लाख या उससे अधिक), तो बायर और सेलर दोनों के PAN नंबर दर्ज करना अनिवार्य होता है। इससे आयकर विभाग रियल एस्टेट लेनदेन पर नजर रख सकता है और काले धन को रोका जा सकता है।
लेकिन हरियाणा के कई ज़िलों में तहसील कार्यालयों पर बैठे कर्मचारियों और बिचौलियों की मिलीभगत से यह अनिवार्यता कागजों में ही रह गई है।
कैसे हो रही है टैक्स चोरी:
- ₹10 लाख से ऊपर की रजिस्ट्री में PAN नंबर छोड़ दिया जाता है।
- संपत्ति की बाजार कीमत कम दर्शाई जाती है।
- कैश ट्रांजैक्शन में डील होती है, जो टैक्स रडार से बच जाती है।
- दलाल/रजिस्ट्री एजेंट तहसील कर्मचारियों से मिलकर फर्जी दस्तावेजों से काम करवाते हैं।
आंकड़ों में घोटाला
- अकेले गुरुग्राम, फरीदाबाद, पंचकूला, सोनीपत, करनाल और रोहतक जैसे बड़े शहरों में हर महीने 50,000+ रजिस्ट्रियां होती हैं।
- अनुमान है कि इनमें से लगभग 30% में PAN की एंट्री नहीं होती।
- इससे आयकर विभाग को प्रतिवर्ष ₹4,500–₹5,000 करोड़ का नुकसान हो रहा है।
नोट: ये आंकड़े मीडिया रिपोर्ट्स और वरिष्ठ अधिकारियों के हवाले से प्राप्त हैं।
कौन है जिम्मेदार?
1. तहसील अधिकारी
जो रजिस्ट्री की फाइनल जांच करते हैं – अगर PAN गायब है, तो उन्हें रजिस्ट्रेशन रोकना चाहिए, लेकिन कई मामलों में जानबूझकर इसे नजरअंदाज किया जा रहा है।
2. पंजीयन कार्यालय के डाटा एंट्री ऑपरेटर
सिस्टम में डेटा फीड करते समय ये ऑपरेटर जानबूझकर PAN एंट्री को स्किप कर देते हैं।
3. एजेंट्स और दलाल
वे ग्राहकों को “काम जल्दी और बिना झंझट” के नाम पर नियमों को दरकिनार करने के लिए प्रेरित करते हैं।
4. आईटी डिपार्टमेंट की सुस्ती
हालांकि डेटा सेंट्रलाइज है, लेकिन अब तक ऑडिट या वेरिफिकेशन की कोई नियमित प्रणाली लागू नहीं हुई है।
सरकार की प्रतिक्रिया
जब मीडिया और RTI एक्टिविस्ट्स ने इस मुद्दे को उठाया, तब हरियाणा सरकार ने मामले को गंभीरता से लेने का दावा किया। कुछ जिलों में जांच शुरू की गई है।
अब तक उठाए गए कदम:
- एक “संपत्ति ट्रांजैक्शन वेरिफिकेशन सेल” का गठन।
- रजिस्ट्री सॉफ्टवेयर में PAN एंट्री को अनिवार्य फ़ील्ड बनाने की योजना।
- हर तहसील में नोडल ऑडिट ऑफिसर की नियुक्ति।
- दोषी कर्मचारियों पर डिसिप्लिनरी एक्शन की शुरुआत।
लेकिन ये सभी कदम अब तक सिर्फ कागज़ों तक सीमित दिखाई देते हैं। ज़मीनी स्तर पर बदलाव ना के बराबर है।
जनता पर प्रभाव
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ईमानदार खरीदार परेशान – जिन लोगों के पास वैध दस्तावेज़ और पूरा पैसा है, उन्हें भी एजेंट “क्लियरेंस” के नाम पर परेशान करते हैं।
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बाज़ार में प्रॉपर्टी की कीमतें कृत्रिम रूप से बढ़ जाती हैं, क्योंकि काले धन का प्रयोग खुलकर होता है।
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न्यायिक मामलों में बढ़ोतरी – गलत रजिस्ट्री या फर्जी मालिकाना हक से कानूनी विवाद बढ़ते हैं।
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शहरी योजनाओं के लिए धन की कमी – क्योंकि राजस्व नहीं आता, सरकार सड़क, सीवरेज, स्ट्रीट लाइट आदि के लिए बजट कम करती है।
विशेषज्ञों की राय
वरिष्ठ टैक्स सलाहकारों और रियल एस्टेट विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सरकार तुरंत सख्त कदम नहीं उठाती है, तो हरियाणा में रियल एस्टेट का सिस्टमिक फेल्योर हो सकता है।
सुझाव:
- AI आधारित वेरिफिकेशन सिस्टम जो बिना PAN नंबर के रजिस्ट्री को रोके।
- पब्लिक ट्रैकिंग पोर्टल जहां लोग चेक कर सकें कि रजिस्ट्री में किन जानकारियों को शामिल किया गया है।
- माहाना रजिस्ट्री ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।
डिजिटल इंडिया का सच?
जब सरकार “डिजिटल इंडिया”, “ई-गवर्नेंस” और “भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन” के बड़े-बड़े दावे करती है, तो हरियाणा जैसे राज्य में इस तरह की टैक्स चोरी सरकार की मंशा पर सवाल खड़ा करती है।
- क्या सिर्फ स्कैनर और कंप्यूटर लगा देने से सिस्टम पारदर्शी बन जाता है?
- क्या डिजिटल सॉफ्टवेयर बिना ईमानदारी के सफल हो सकते हैं?
- क्या जनता को इसकी शिकायत दर्ज करवाने की सुविधाएं मिलती हैं?
आगे क्या होना चाहिए?
✅ सिस्टम में सुधार के 5 उपाय:
- e-RajNiti पोर्टल पर प्रत्येक रजिस्ट्री की सार्वजनिक सूची उपलब्ध कराई जाए।
- ऑनलाइन रजिस्ट्री के समय OTP वेरिफिकेशन बायर व सेलर दोनों से लिया जाए।
- निजी वकीलों की बजाय सरकार द्वारा अप्रूव्ड वेंडर ही रजिस्ट्री कर सकें।
- RTI में पारदर्शिता लाने के लिए हर महीने Data Dump जारी हो।
- यदि PAN नंबर नहीं है, तो संपत्ति पर जुर्माना और ट्रांजैक्शन रद्द करने का प्रावधान हो।
निष्कर्ष
हरियाणा में संपत्ति रजिस्ट्रेशन प्रणाली में जो टैक्स चोरी हो रही है, वह केवल सरकारी राजस्व का नुकसान नहीं है — यह जनता की मेहनत की कमाई पर हमला है। जब सिस्टम ही धोखा दे रहा हो, तो केवल जनता से ईमानदारी की उम्मीद करना अन्याय है।
अब समय है कि सरकार न सिर्फ सख्ती दिखाए, बल्कि पारदर्शिता, तकनीक और ईमानदारी को मिलाकर एक ऐसा सिस्टम बनाए, जो हरियाणा को उदाहरण बना सके – अन्य राज्यों के लिए भी।
आप क्या सोचते हैं?
क्या आपको लगता है कि हर रजिस्ट्री पर पब्लिकली वेरिफायबल PAN जानकारी होनी चाहिए?
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